Ram Gopal Kothari – सनलाइट, कोलकाता। कोलकाता के बड़ाबाज़ार की तंग गलियों और एस्बेस्टस की छत वाले कमरों से शुरू हुआ एक सफर, दुनिया के सबसे दूरस्थ और कठिन भौगोलिक छोर 90° North (उत्तरी ध्रुव) तक पहुँचेगा यह कल्पना कभी किसी ने नहीं की थी।
Ram Gopal Kothari
एक समय मंदी और कर्ज़ की मार से पूरी तरह टूटकर जीवन समाप्त करने के मुहाने पर खड़े राम गोपाल कोठारी की यह कहानी केवल एक व्यक्ति की सफलता का किस्सा नहीं है, बल्कि हार न मानने के उस अटूट जज़्बे की गाथा है जो असफलता की सबसे गहरी खाइयों से उठकर इतिहास रचने का दम रखती है।
सातों महाद्वीपों की यात्रा से लेकर अंटार्कटिका, किलिमंजारो और नॉर्थ पोल की बर्फ पर मैराथन फतह करने वाले राम गोपाल की यह अनूठी जीवन-यात्रा हर उस इंसान के लिए उम्मीद की एक नई किरण है, जो जीवन के संघर्षों से घबराकर हिम्मत हारने लगता है।

सनलाइट से बातचीत में रामगोपाल ने बताया कि कोलकाता के बड़ाबाज़ार में हमेशा दौड़ती जिंदगी के बीच Ram Gopal Kothari का बचपन बीता।
उस समय न कोई कल्पना थी कि कभी सातों महाद्वीपों तक पहुंचना है, न दुनिया के दूर-दराज देशों को देखने का सपना और न ही यह अंदाजा कि एक दिन यही सफर पृथ्वी के भौगोलिक उत्तरी ध्रुव 90° उत्तर तक पहुंचेगा।
बचपन की पढ़ाई श्री माहेश्वरी विद्यालय में हुई। एक सामान्य विद्यार्थी की तरह स्कूल जाना, दोस्तों के साथ समय बिताना और उसी माहौल में बड़े होते जाना, जीवन में तब ऐसा कुछ नहीं था जिससे आने वाले असाधारण सफर का अंदाजा लगाया जा सके।
लेकिन बड़ाबाज़ार अपने आप में एक पाठशाला था। यहां बचपन से ही मेहनत, व्यापार, संघर्ष और कम साधनों में आगे बढ़ते लोगों को करीब से देखने का मौका मिला। शायद जिंदगी की व्यावहारिक शिक्षा किताबों से पहले इन्हीं गलियों ने दे दी थी।
स्कूल के बाद अगला पड़ाव था भवानीपुर कॉलेज। अब बड़ाबाज़ार की परिचित दुनिया से बाहर निकलकर एक नई दुनिया सामने आने लगी थी। कॉलेज की उम्र अपने साथ आजादी, दोस्ती, नए अनुभव और भविष्य के सपने लेकर आई।
लेकिन आने वाले कुछ वर्षों में जिंदगी ऐसा मोड़ लेने वाली थी जिसकी कल्पना उस कॉलेज जाने वाले युवक ने कभी नहीं की थी।
बड़ाबाज़ार की उस छोटी-सी छत पर खड़े होकर आसमान तो रोज दिखाई देता था…बस तब यह नहीं मालूम था कि एक दिन सफर उसी आसमान के नीचे दुनिया के आखिरी छोर तक पहुंच जाएगा।
कॉलेज के बाद Ram Gopal Kothari के सामने भी वही सवाल था जो हजारों युवाओं के सामने होता है कि अब जिंदगी में आगे क्या?
जुलाई 2002 में उन्होंने अपनी पहली नौकरी शुरू की। काम था होम लोन के लिए लोगों के बीच पैम्फलेट बांटना और ग्राहकों तक पहुंचना। पहली तनख्वाह थी महज ₹3,500 महीना। लेकिन शायद यहीं पहली बार उनकी वह खूबी सामने आई जो आगे चलकर उनकी जिंदगी बदलने वाली थी—लोगों तक पहुंचने और लगातार मेहनत करने की क्षमता।
जुलाई 2003 तक 3,500 कमाने वाला युवक 35,000 महीने तक पहुंच चुका था। सफलता के बाद सफलता मिल रही थी। करियर आगे बढ़ रहा था और जिंदगी भी खूबसूरत दिशा में जाती दिखाई दे रही थी।
कॉलेज के दिनों में मिलीं शिप्रा अब जिंदगी का सबसे अहम हिस्सा बन चुकी थीं। नौकरी अच्छी चल रही थी, परिवार में खुशियां थीं।
ऐसा लग रहा था जैसे वर्षों की मेहनत ने जिंदगी को सही रास्ते पर ला दिया है। लेकिन जिंदगी ने अचानक पूरी कहानी पलट दी। 2008 की वैश्विक आर्थिक मंदी ने लोन के कारोबार को बुरी तरह प्रभावित किया और राम की नौकरी चली गई।
कुछ समय पहले तक 35,000 महीने कमाने वाला व्यक्ति अचानक बेरोजगार था। हालात कितने बदल चुके थे, इसका अंदाजा एक घटना से लगाया जा सकता है कि एक साल के बेटे के लिए राम के पास 2,500 के टीके के लिए भी पैसे नहीं थे।
जिस पिता ने अपने परिवार को बेहतर भविष्य देने के सपने देखे थे, उसके लिए यह क्षण भीतर तक तोड़ देने वाला था। लेकिन उन्होंने कोशिश बंद नहीं की। 2008 में ही उन्होंने नई नौकरी शुरू की।
लगभग पांच महीने काम करने के बाद उन्होंने इस बार अपना व्यवसाय खड़ा करने का फैसला किया। करीब ₹4 लाख का कर्ज लेकर कपड़ों का व्यवसाय शुरू किया।
2009 में चक्रवात आइला आया। भारी बारिश का पानी एस्बेस्टस की छत से अंदर रिसता चला गया। घर में रखे कपड़े और तैयार माल पानी में खराब हो गए।
एक ही झटके में कारोबार लगभग खत्म हो गया। माल चला गया, लेकिन ₹4 लाख के कर्ज का बोझ सिर पर रह गया। फिर एक रिश्तेदार ने उन्हें बीमा के क्षेत्र में काम करने का अवसर दिया।
Ram Gopal Kothari ने एक बार फिर वही किया जो उन्होंने अपनी पहली नौकरी में किया था कि लोगों तक खुद पहुंचना। इस बार हाथ में इंश्योरेंस के कोटेशन थे।
वे लगातार कोटेशन बांटते, ग्राहकों से मिलते, बीमा समझाते और दिन-रात मेहनत करते। धीरे-धीरे परिणाम आने लगे। ग्राहक जुड़े और सफलता एक बार फिर जिंदगी में लौटने लगी।
2011 में दूसरे बेटे का जन्म हुआ। जिम्मेदारियां बड़ी थीं, लेकिन मेहनत से जिंदगी फिर संभलती दिखाई दे रही थी। मगर किस्मत ने एक बार फिर रास्ता बदल दिया। राम का वह काम भी चला गया।
इस बार स्थिति पहले से कहीं अधिक कठिन थी। अब वह अकेले नहीं थे। पत्नी शिप्रा, दो छोटे बेटे दर्श और गरव, माता-पिता—पूरा परिवार सामने था और हाथ में पैसे नहीं थे।वर्षों से जिंदगी को बार-बार खड़ा करते और फिर टूटते देखने का दबाव भीतर जमा होता गया।
और फिर एक दिन घर में झगड़ा हुआ। निराशा, आर्थिक दबाव और लगातार मिल रहे झटकों के बीच राम घर से निकल गए। कदम उन्हें मेट्रो स्टेशन तक ले गए। मन में एक ही विचार था— सब कुछ खत्म कर देना।
जिस युवक ने ₹3,500 से शुरुआत करके एक साल में ₹35,000 तक का सफर तय किया था… जिसने नौकरी खोकर फिर नौकरी की… कर्ज लेकर कारोबार खड़ा किया… चक्रवात में सब गंवाकर फिर बीमा में शुरुआत की…वह उस दिन जिंदगी से हारने के बिल्कुल किनारे खड़ा था।
परिवार की जिम्मेदारियां, बार-बार छिनता रोजगार, कारोबार का नुकसान, कर्ज और घर में हुआ झगड़ा—सब कुछ एक साथ दिमाग में चल रहा था। उन्हें लग रहा था कि शायद अब कोई रास्ता नहीं बचा।
तभी मोबाइल फोन बजा।दूसरी तरफ उनकी पत्नी शिप्रा थीं। उस फोन कॉल ने राम के कदम रोक दिए। बातचीत के बाद वह मेट्रो से वापस घर लौट आए। समस्याएं खत्म नहीं हुई थीं।
अगले दिन भी पैसे नहीं थे, जिम्मेदारियां उतनी ही थीं और भविष्य भी अनिश्चित था। लेकिन एक फैसला बदल चुका था—अब जिंदगी खत्म नहीं करनी थी।
उसे फिर से शुरू करना था। बीमा के क्षेत्र में काम करने का अनुभव उनके पास था। उन्होंने तय किया कि अब किसी नौकरी के भरोसे नहीं रहेंगे, बल्कि अपना काम खुद खड़ा करेंगे। न कोई बड़ा ऑफिस था, न कर्मचारी, न कोई स्थापित नाम।
फिर वही पुराना हथियार काम आया—मेहनत और लोगों तक खुद पहुंचना।राम हाथ में इंश्योरेंस के कोटेशन लेकर घर-घर जाने लगे। दरवाजे खटखटाते, लोगों से मिलते, बीमा समझाते और उनसे एक मौका मांगते। धीरे-धीरे मेहनत रंग लाने लगी और जिंदगी एक बार फिर पटरी पर आने लगी।
जिस व्यक्ति के पास कुछ समय पहले अपने परिवार को संभालने के लिए पैसे नहीं थे, वही अब अपने दम पर व्यवसाय खड़ा कर रहा था। सफलता के इसी दौर में एक बीमा कंपनी की ओर से उन्हें दुबई जाने का अवसर मिला।
यह यात्रा उनकी जिंदगी में एक नया मोड़ बन गई। दुबई पहुंचकर उन्होंने पहली बार महसूस किया कि दुनिया उस बड़ाबाज़ार से कितनी बड़ी है, जहां उनका बचपन बीता था। यहीं से यात्रा का एक नया जुनून शुरू हुआ।
अब जब भी अवसर मिलता राम किसी नई जगह, नए देश और नई संस्कृति को देखने निकल पड़ते। पासपोर्ट हालांकि कुछ समय बाद दुनिया धीरे-धीरे खुली। उड़ानें शुरू हुईं। यात्रा फिर संभव हुई और अंटार्कटिका का अधूरा सपना दोबारा सामने था।
आखिरकार वह तारीख आई— 22 नवंबर 2022। राम गोपाल कोठारी ने अंटार्कटिका की बर्फ पर कदम रखा। और उसी कदम के साथ उन्होंने दुनिया के सातों महाद्वीपों की यात्रा पूरी कर ली।
Ram Gopal Kothari 2023 में ग्रीनलैंड पहुंचे। अगली चुनौती बर्फ पर नहीं, हजारों मीटर की ऊंचाई पर थी। नजर पड़ी अफ्रीका की सबसे ऊंची चोटी माउंट किलिमंजारो पर।
कठिन चढ़ाई, बढ़ती ऊंचाई, कम होती ऑक्सीजन और थकान को पार करते हुए आखिरकार 14 अगस्त 2024 को राम गोपाल लगभग 5,895 मीटर ऊंचे माउंट किलिमंजारो की चोटी तक पहुंच गए।
उस समय एक और सपना उनके भीतर जन्म ले चुका था – नार्थ पोल तक पहुंचना। उन्होंने वहां 42.195 किलोमीटर की फुल मैराथन दौड़ने का फैसला किया।
सबसे आश्चर्यजनक बात यह थी कि उन्होंने इससे पहले जिंदगी में कभी कोई फुल मैराथन पूरी नहीं की थी। नॉर्थ पोल के इस अभियान और मैराथन में हिस्सा लेने के लिए राम ने भारतीय मुद्रा में करीब ₹40 लाख से अधिक खर्च किए।
आखिरकार जुलाई 2025 में वह आइसब्रेकर जहाज से उस जगह पहुंचे। 13 जुलाई 2025 को उनके पैरों के नीचे जमीन नहीं थी।
नीचे था आर्कटिक महासागर और उसके ऊपर तैरती हुई समुद्री बर्फ। इस दौरान कई जगह पैर बर्फ में धंस रहे थे। अंतिम 14–16 किलोमीटर में रास्ता स्लश में बदल चुका था। जूतों में बर्फ और पानी भर गया।
पैर तकलीफ दे रहे थे। शरीर में बार-बार क्रैम्प आए। लेकिन एक-एक कदम आगे बढ़ता गया और आठ घंटे के संघर्ष के बाद 42.195 किलोमीटर पूरे हुए और राम गोपाल कोठारी भौगोलिक उत्तरी ध्रुव 90°उत्तर पर फुल मैराथन पूरी करने वाले पहले भारतीय बने।
कभी बड़ाबाज़ार की एस्बेस्टस वाली छत के नीचे रहने वाला बच्चा उस दिन सचमुच “दुनिया की छत” तक पहुंच चुका था। लेकिन जिंदगी की कहानी में अभी एक अध्याय बाकी था।
बर्फ से ज्वालामुखी तक – ईस्टर आइलैंड नॉर्थ पोल के बाद अगली चुनौती पृथ्वी के बिल्कुल दूसरे हिस्से में इंतजार कर रही थी।
प्रशांत महासागर के बीच स्थित रापा नुई यानी ईस्टर आइलैंड—दुनिया के सबसे दूरस्थ बसे द्वीपों में से एक, जो अपनी विशाल मोआई प्रतिमाओं और ज्वालामुखीय भूभाग के लिए जाना जाता है।
नॉर्थ पोल की बर्फ के बाद इस बार चुनौती थी बोल्केनो मैराथन की। और तारीख थी— 28 जून 2026। पहले लगभग 21 किलोमीटर अपेक्षाकृत सामान्य सड़क पर थे, लेकिन आगे रास्ता कठिन होता गया। लगभग 30 किलोमीटर के बाद ओरोंगो के ज्वालामुखीय क्षेत्र की चढ़ाई शुरू हुई।
नॉर्थ पोल पर चुनौती बर्फ और ठंड थी; यहां ज्वालामुखीय रास्ते, चढ़ाई-उतराई और थकान परीक्षा ले रहे थे। आखिरी किलोमीटरों में एक समय ऐसा भी आया जब राम लगभग रास्ता भटक गए। लेकिन इस बार भी कदम नहीं रुके।
उन्होंने 42.195 किलोमीटर की मैराथन पूरी की और रापा नुई (ईस्टर आइलैंड) में फुल मैराथन पूरी करने वाले पहले भारतीय बने।
नॉर्थ पोल की तैरती बर्फ से ईस्टर आइलैंड के ज्वालामुखियों तक—एक वर्ष से भी कम समय में दो ऐसी मैराथन, जिनके नाम अब उनकी जिंदगी की कहानी का हिस्सा बन चुके थे।
आज पीछे मुड़कर देखें तो इस कहानी का सबसे बड़ा रिकॉर्ड न 5,895 मीटर ऊंचा किलिमंजारो है, न 42.195 किलोमीटर की कोई मैराथन और न ही दुनिया के दूरस्थ कोनों तक पहुंचना।
सबसे बड़ी दूरी वह है जिसे किसी नक्शे पर नहीं मापा जा सकता। बड़ाबाज़ार की उस छोटी-सी छत से मेट्रो स्टेशन तक… मेट्रो स्टेशन से जिंदगी में वापस लौटने तक… वहां से सातों महाद्वीपों तक…किलिमंजारो की चोटी से 90° उत्तर तक… और नॉर्थ पोल की बर्फ से ईस्टर आइलैंड के ज्वालामुखियों तक।
जिस व्यक्ति ने कभी जिंदगी खत्म करने के लिए मेट्रो की ओर कदम बढ़ाए थे, उसी व्यक्ति ने बाद में जिंदगी को इतना बड़ा बना दिया कि दुनिया का नक्शा भी छोटा पड़ने लगा।
शायद राम गोपाल कोठारी की कहानी का सबसे बड़ा संदेश भी यही है— “जिंदगी के किसी एक बुरे दिन को अपनी पूरी जिंदगी का फैसला मत करने दीजिए।
क्योंकि आपको नहीं पता कि आज जिस जिंदगी से आप हार मान रहे हैं, वही जिंदगी कल आपको कहां तक ले जाने वाली है।”
