Narsingh Mela – कोलकाता का बड़ाबाजार क्षेत्र न केवल व्यापार का केंद्र है, बल्कि यह राजस्थानी और प्रवासी समुदायों की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को भी समेटे हुए है।
Narsingh Mela
यहाँ आयोजित होने वाला बांसतल्ला का ऐतिहासिक नृसिंह मेला पिछले लगभग 100 वर्षों से भी ज्यादा समय से श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जा रहा है।
पुष्टिमार्गीय जड़ें और मेले का उद्भव – इस भव्य आयोजन की शुरुआत लगभग एक सदी पहले बलदेव जी मंदिर से हुई थी।
प्रारंभ में यह पुष्टिमार्गीय पद्धति के अनुसार नृसिंह जयंती और व्रत के रूप में मनाया जाता था। समय के साथ हर्ष बंधुओं ने इस परंपरा को जन-जन तक पहुँचाया।
स्व. मगल लाल हर्ष, स्व मेघराज हर्ष और स्व चांद रतन हर्ष ने इस उत्सव को बलदेव जी मंदिर से निकालकर बाँसतल्ला भैरू मंदिर के प्रांगण में एक विस्तृत मेले का स्वरूप दिया।
काशी के मुखौटे और ऐतिहासिक बदलाव – मेले के शुरुआती दौर में काशी (वाराणसी) से विशेष रूप से धातु के भारी मुखौटे बनवाए गए थे।
किंवदंतियों के अनुसार, भगवान नृसिंह का वह ऐतिहासिक मुखौटा लगभग 4 किलो भारी था। सुरक्षा और कलाकारों की सुविधा को देखते हुए, बाद में मेघराज हर्ष वाराणसी से एक हल्का मुखौटा बनवा कर लाए।
पुराने ऐतिहासिक भारी मुखौटे को दिवंगत तन्नी जी हर्ष द्वारा पवित्र गंगा के मध्य विसर्जित कर उसे ससम्मान विदाई दी गई थी।
परंपरा के संवाहक: प्रमुख पात्र और कलाकार – इस मेले की भव्यता उन कलाकारों के समर्पण पर टिकी है, जिन्होंने दैवीय पात्रों को जीवंत किया।
इसमें गिरिराज हर्ष का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है, जिन्होंने लगभग 30 वर्षों तक अनवरत भगवान नृसिंह का कठिन वेश धारण कर इस परंपरा को अपनी साधना से सींचा।
इनसे पहले सिनजी आचार्य, गंगा दास कलवानी, श्याम सुंदर व्यास, रमण लाल आचार्य, गिरधर गोपाल हर्ष, लाला व्यास, बुलाकी हर्ष और तन्नी हर्ष ने इस स्वरूप को निभाया। गोपालजी व्यास ने भी सर्वाधिक बार नृसिंह बनकर अपनी सेवाएँ दीं।
हिरण्यकशिपु का पात्र: इस चुनौतीपूर्ण पात्र को ब्रह्म देव रंगा, किशन छंगाणी, शंकर आचार्य, आशुतोष पुरोहित, गोपाल हर्ष, लालजी व्यास, रमनलाल आचार्य, कमलकिशोर व्यास, रामदेव रंगा, महेश आचार्य, श्याम सुंदर पुरोहित और दिव्यांग हर्ष जैसे कलाकारों ने अपनी कला से जीवंत किया।
Narsingh Mela – योगदान और व्यवस्था की रीढ़ – मेले को सुचारू रूप से चलाने और इसे इस मुकाम तक पहुँचाने में समाज के अनेक स्तंभों का योगदान रहा है।
स्व. राम किशन नथानी, स्व. पन्ना लाल दूजारी और स्व. चम्पा लाल दधीचि जैसे वरिष्ठों ने इसका मार्ग प्रशस्त किया।
वहीं सी.पी. दधीचि, राधे हर्ष, झबरू दूजारी, सपन बर्मन और विजय ओझा जैसे व्यक्तित्वों ने अपनी समर्पित सेवाओं से व्यवस्थाओं को संभाला।
वर्तमान स्वरूप और भविष्य की पीढ़ी – आज के व्यस्त और भीड़भाड़ वाले युग में भी चांद रतन के वंशज दीपक हर्ष, जगदीश हर्ष औऱ रोहित हर्ष बाँसतल्ला वासियों के साथ मिलकर इस मशाल को जलाए हुए हैं।
वर्तमान में युवा पीढ़ी नवरतन आचार्य, नंदू किराडू और नंदन किराडू पूरी सक्रियता और श्रद्धा के साथ इस विरासत को आगे बढ़ा रही है।
Narsingh Mela – कोलकाता के बड़ाबाजार का यह नृसिंह मेला केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि प्रवासी समाज की अपनी जड़ों से जुड़े रहने की गौरवशाली कहानी है।
विभिन्न समाजों और स्थानीय सहयोगियों की यह सामूहिक सहभागिता महानगर की सांस्कृतिक विविधता को और अधिक समृद्ध बनाती है।
