सनलाइट, भीलवाड़ा। साहित्यिक, सांस्कृतिक, सामाजिक एवं वैचारिक संस्था “सन्दर्भ समीक्षा समिति” द्वारा अपने प्रथम स्थापना दिवस पर पुस्तक लोकार्पण एवं सम्मान समारोह महाराजा रेस्टोरेन्ट, भीलवाड़ा के सभागार में आयोजित किया गया।
कार्यक्रम का शुभारम्भ अध्यक्ष डॉ. भैरूंलाल गर्ग, मुख्य अतिथि प्रो. डॉ. हेमराज मीणा, विशिष्ट अतिथि विट्ठल पारीक, जयपुर, एवं संस्था अध्यक्ष प्रहलाद पारीक द्वारा माँ सरस्वती के चित्र के समक्ष दीप प्रज्वलित कर माल्यार्पण के साथ हुआ।
सन्तोष जोशी द्वारा सरस्वती वंदना तथा मधु शर्मा द्वारा गणेश वन्दना प्रस्तुत की गयी। मंचासीन अतिथियों का तिलक, उत्तरीय, कण्ठहार, श्रीफल व मेवाडी पगड़ी द्वारा स्वागत अभिनंदन किया गया।
संस्था अध्यक्ष प्रहलाद पारीक ने स्वागत उद्बोधन में सभी मंचासीन अतिथियों का तथा प्रेक्षागार में उपस्थित सभी आगंतुक महानुभावों का इस सारस्वत अनुष्ठान में पधारने पर स्वागत अभिनंदन किया। संस्था महासचिव वीरेंद्र कुमार लोढ़ा ने संस्था द्वारा वर्ष-पर्यन्त की गई गतिविधियों एवं आगामी योजनाओं का ब्यौरा वार्षिक प्रतिवेदन में प्रस्तुत किया।
कार्यक्रम के सम्मान सत्र में अशोक रक्ताले, उज्जैन को काव्य गौरव सम्मान-2019, जयसिंह आशावत, नैनवा को दोहा रत्न सम्मान-2019, सन्तोष कुमार सिंह, मथुरा को साहित्य गौरव सम्मान-2019, मायामृग, जयपुर को साहित्य रत्न सम्मान-2019 तथा डॉ. हेमलता को सामयिकी काव्य गौरव सम्मान-2018 से सम्मानित किया गया। सम्मान स्वरूप शॉल, उत्तरीय, कण्ठहार, मेवाडी पगड़ी, श्रीफल, सम्मान पत्र व सम्मान चिह्न एवं दो हजार एक सौ रुपये की नकद राशि
प्रदान की गई।
संचालक रेखा लोढ़ा स्मित ने सम्मानित साहित्यकारों का गद्यात्मक एवं पद्यात्मक परिचय का वाचन किया।
पुस्तक लोकार्पण सत्र में मायामृग, अशोक रक्ताले व जयसिंह आशावत को विशिष्ट अतिथि के रूप में मंचासीन किया गया। मंचासीन अतिथियों द्वारा रेखा लोढ़ा स्मित एवं वीरेन्द्र कुमार लोढ़ा द्वारा सम्पादित दोहा संकलन टुकड़ा-टुकड़ा धूप” का लोकार्पण किया गया। इस संकलन में भँवर प्रेम, जी. पी. पारीक, ज्योत्सना सक्सेना, नरेन्द्र दाधीच, प्रहलाद पारीक, रेखा लोढ़ा स्मित एवं शकुन्तला अग्रवाल शकुन के 100-100 दोहों को संकलित किया गया है।
पुस्तक पर चर्चा करते हुए अशोक रक्ताले ने संकलन पर अपने विचार व्यक्त किए। मायामृग ने अपने उद्बोधन में कहा कि एक रचनाकार का सबसे बड़ा कार्य है अपने समय को रेखांकित करना, पर हमारा दुर्भाग्य है कि हम या तो बीते हुए कल में जीते हैं या आने वाले कल में। गलत को गलत कहने की हिम्मत एक रचनाकार में होनी चाहिए। सभी सहभागी दोहाकारों को उत्तरीय, कण्ठहार, श्रीफल, सहभागिता प्रमाण-पत्र व स्मृति चिह्न प्रदान किए गए।
इसके बाद शकुन्तला अग्रवाल शकुन की दोहा कृति बाकी रहे निशान का लोकार्पण मंचस्थ अतिथियों कृतिकार एवं परिजनों द्वारा किया गया। जयसिंह आशावत एवं डॉ. भैरूंलाल गर्ग ने पुस्तक पर अपना समीक्षात्मक उद्बोधन दिया।
दिल्ली के सुशील शैली, मथुरा के सन्तोष कुमार सिंह, ऋषभदेव के उपेंद्र अणु, डॉ. कमलाकान्त कमल, राजेन्द्र गोपाल व्यास, निपुण शुक्ला ने अपनी काव्य रचनाओं से वातावरण को सुरभित किया।
कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथि विट्ठल पारीक ने अपने उद्बोधन में कहा कि 60 के दशक में पाठक बहुत थे और लेखक कम, पर आज लेखक बहुत हैं और पाठकों का अभाव है। आज लोकार्पित हुए दोहा संग्रहों में समय का लेखा-जोखा है। मैं सभी दोहकारों को बधाई देता हूँ।
मुख्य अतिथि प्रो. डॉ. हेमराज मीणा ने वर्तमान पस्थितियों पर चिन्ता व्यक्त करते हुए कहा कि हम बहुत बड़े वैचारिक और अर्थ संकट के दौर से गुजर रहे हैं। भाषा पर चर्चा करते हुए कहा कि हम विभिन्न बोलियों का प्रयोग करते हैं। इन जनपदीय बोलियों का वैविध्य, बिखरा हुआ लोक-साहित्य, कहावतें व मुहावरें हैं, उन्हें हम भूलते जा रहे हैं।
यदि हम चाहते हैं कि हिन्दी संयुक्त राष्ट्र संघ में विश्व भाषा बने तो जो गलती मैथिली के साथ हुई वह नहीं दोहरानी चाहिए। यदि भाषा के स्तर पर राजस्थानी को मान्यता दी गई तो हिन्दी का नुकसान होगा, हिन्दी कमजोर होगी।
संस्था कोषाध्यक्ष जयप्रकाश भाटिया ने आभार ज्ञापित किया।
