Narsingh Mela – कोलकाता के व्यापारिक हृदय स्थल बड़ाबाजार की तंग गलियाँ केवल व्यापार के लिए ही नहीं, बल्कि अपनी अटूट सांस्कृतिक विरासत के लिए भी विख्यात हैं।

Narsingh Mela
यहाँ की ढाकापट्टी स्थित अखाड़ा गली में आयोजित होने वाला ‘नरसिंह जयंती महोत्सव’ इसका सबसे अनुपम उदाहरण है।
इस परंपरा का विशेष ऐतिहासिक तथ्य यह है कि वर्ष 1946 में इसका श्रीगणेश हुआ था। आजादी के सूर्योदय से पूर्व शुरू हुई यह यात्रा आज करीब 80 वर्षों से निरंतर जारी है।
ऐतिहासिक विरासत – इस भव्य आयोजन की नींव 1946 में स्वर्गीय गोपाल लाल व्यास और स्वर्गीय वेदमित्र व्यास द्वारा रखी गई थी।
अखाड़ा स्थित महादेव जी मंदिर के प्रांगण से शुरू हुआ यह भक्ति मार्ग समय के साथ एक विशाल मेले और क्षेत्रीय पहचान में तब्दील हो गया। आठ दशकों का यह अटूट क्रम यहाँ के निवासियों की गहरी आस्था को दर्शाता है।
समर्पित व्यक्तित्व – इस महोत्सव की सफलता के पीछे कुछ ऐसे नाम हैं जिन्होंने अपना जीवन इस परंपरा को समर्पित कर दिया है।
कैलाश हर्ष – इन्होंने बचपन में ‘भक्त प्रह्लाद’ और फिर ‘हिरण्यकश्यप’ की भूमिका निभाई। पिछले 30 वर्षों से अधिक समय से वे निरंतर भगवान नरसिंह का स्वरूप धारण कर रहे हैं। उनके रौद्र रूप के दर्शन के लिए अखाड़ा गली में जनसैलाब उमड़ पड़ता है।
नेतृत्व – परंपरा को सींचती वर्तमान पीढ़ी
व्यास परिवार की पीढ़ियों ने इस विरासत की मशाल को कभी बुझने नहीं दिया।
वर्तमान में इस महोत्सव का सफल संचालन गिरधारीलाल व्यास और हलधारी लाल जी व्यास के कुशल मार्गदर्शन में हो रहा है।
आयोजन को भव्यता प्रदान करने में राजकुमार ‘काकू’ व्यास, महेश आचार्य, कमला हर्ष, नई पीढ़ी में वर्दमूर्ति व्यास, जगदीश हर्ष, रितेश आचार्य कंधे से कंधा मिलाकर सक्रिय रहते हैं।
सांस्कृतिक महत्व – एकता और आस्था का संगम
यह आयोजन केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि बड़ाबाजार की उस सामाजिक एकता का प्रतीक है जहाँ व्यापारिक व्यस्तताओं के बीच भी अपनी जड़ों और परंपराओं को सर्वोच्च स्थान दिया जाता है।
अखाड़ा गली की यह ‘नरसिंह लीला’ बुराई पर अच्छाई की विजय का संदेश देते हुए हर वर्ष कोलकाता के सांस्कृतिक वैभव को नई ऊँचाई प्रदान करती है।
