Narsingh Mela – अपनी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत के लिए प्रसिद्ध कोलकाता का बड़ाबाजार क्षेत्र केवल व्यापार का केंद्र ही नहीं, बल्कि आस्था और परंपराओं का भी संगम स्थल है।
Narsingh Mela
इसी क्षेत्र की ढाकापट्टी में स्थित सदियों पुराना शिव मंदिर एक ऐसी ही जीवंत परंपरा का साक्षी है— ‘नरसिंह जी का मेला’।
पिछले 74 वर्षों से अनवरत चला आ रहा यह आयोजन आज भी अपनी उसी दिव्यता और भव्यता को समेटे हुए है।
परंपरा की नींव – इस ऐतिहासिक यात्रा का शुभारंभ सन् 1952 में चांद रतन पुरोहित ने किया था। उन्होंने नरसिंह जयंती के पावन अवसर पर इस मेले की नींव रखी थी।
जो पौधा उन्होंने सत्तर के दशक के पहले रोपा था, वह आज एक विशाल वटवृक्ष का रूप ले चुका है। उनके बाद उनके वंशजों ने इस जिम्मेदारी को न केवल संभाला, बल्कि पूरी श्रद्धा के साथ इसे आगे बढ़ाया।
जड़ों से जुड़ाव – इस मेले की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि समय के साथ पपलो जी पुरोहित के वंशज और परिवार के सदस्य अब बड़ाबाजार से दूर अन्य क्षेत्रों में बस गए हैं।
लेकिन अपनी परंपरा के प्रति अटूट निष्ठा ऐसी है कि मेले से एक रात पहले परिवार का हर सदस्य ढाकापट्टी स्थित अपने पुराने आवास पर एकत्रित होता है।
यह मिलन न केवल परिवार को जोड़ता है, बल्कि पूर्वजों द्वारा शुरू की गई इस आध्यात्मिक सेवा को पुनः जीवित कर देता है।
वर्तमान में इस मेले का सफल संचालन आशु पुरोहित, बलदेव पुरोहित और लोकनाथ पुरोहित द्वारा अपने सहयोगियों के साथ मिलकर किया जा रहा है। इन युवाओं का जोश और अपने संस्कारों के प्रति समर्पण ही इस मेले की निरंतरता का आधार है।
भक्ति का स्वरूप – मेले का मुख्य आकर्षण भगवान नरसिंह का सजीव स्वरूप होता है। लंबे समय तक पंडित कालिदास किराडू ने भगवान नरसिंह का रूप धारण कर भक्तों को कृतार्थ किया।
अब इसी गौरवशाली उत्तरदायित्व को उनके पुत्र पंडित अनंत किराडू (अंतू) पूरी निष्ठा और श्रद्धा के साथ निभा रहे हैं।
ढाकापट्टी के नरसिंह देव की एक और विशिष्टता यहाँ का मुखौटा है। माना जाता है कि पूरे बड़ाबाजार में नरसिंह देव के जितने भी स्वरूप हैं, उनमें यह मुखौटा सबसे बड़ा और भारी धातुओं से निर्मित है।
इसकी बनावट और प्राचीनता भक्तों के बीच विशेष आकर्षण और श्रद्धा का केंद्र रहती है। 74 वर्षों का यह सफर मात्र एक आयोजन नहीं, बल्कि आस्था, पारिवारिक एकजुटता और कोलकाता की लोक संस्कृति का अद्भुत प्रमाण है।
